अन्य भाषाओं का वरदान: मसीही दृष्टि, बाइबिलीय सत्य और कलीसिया में शिक्षा

अन्य भाषाओं का वरदान: मसीही दृष्टि और कलीसिया में शिक्षा

अन्य भाषाओं का वरदान: मसीही दृष्टि और कलीसिया में शिक्षा

बाइबलीय विवेचन, Essential व Non-Essential Doctrine और कलीसिया के लिए संतुलित मार्गदर्शन
लेख: मसीही अध्ययन · संदर्भ वचन: प्रेरितों 2:4; 1 कुरिन्थियों 13:1; 14:4–27 · प्रकाशित: आज

आज के समय में मसीही जगत में एक विषय विशेष रूप से विवाद और चर्चा का कारण बना हुआ है — “अन्य भाषाओं का वरदान (Gift of Tongues)”। कुछ सेवक इसे आत्मिक, स्वर्गीय भाषा मानते हैं, जबकि अन्य इसे मानव-भाषाओं के रूप में देखते हैं। यह लेख उसी विषय पर बाइबलीय, थियोलॉजिकल और कलीसियाई दृष्टि से संतुलित मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।

1. बाइबल में अन्य भाषाओं का वर्णन

(क) पेन्टेकोस्ट का दिन — प्रेरितों के काम 2

पवित्र आत्मा के उतरने के बाद चेलों ने अन्य भाषाएँ बोलना आरम्भ किया, और वह ऐसा हुआ कि प्रतिजाति के लोग अपनी-अपनी भाषा में सुन रहे थे — यह स्पष्ट रूप से प्रारम्भिक कलीसिया में पहचानी जाने वाली मानव भाषाओं का चमत्कार दर्शाता है ताकि सुसमाचार सभी राष्ट्रों तक पहुँच सके।

“और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और आत्मा के निर्देशानुसार अन्य भाषाएँ बोलने लगे।” — प्रेरितों 2:4

(ख) कुरनेलियुस के घर में — प्रेरितों 10

जब पवित्र आत्मा अन्यजातियों पर उतरता है तो वे भी भाषाएँ बोलकर परमेश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं—यह प्रमाण है कि भाषाएँ आत्मिक साक्ष्य और परमेश्वर की स्तुति का एक माध्यम हैं।

“तब उन्होंने भाषाएँ बोलकर परमेश्वर की महिमा का वर्णन किया।” — प्रेरितों 10:46

(ग) पौलुस की शिक्षा — 1 कुरिन्थियों 12–14

पौलुस भाषाओं के महत्व और उपयोग पर संतुलित शिक्षा देते हैं। उनका दृश्‍टान्त स्पष्ट है—भाषाएँ व्यक्तिगत उन्नति और कलीसिया के निर्माण दोनों के लिए हैं, परन्तु सार्वजनिक सभा में व्याख्या अनिवार्य है।

“यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की भाषाएँ भी बोलूँ, पर प्रेम न रखूँ, तो मैं झनझनाता पीतल हूँ।” — 1 कुरिन्थियों 13:1

2. Essential और Non-Essential Doctrine

(क) Essential Doctrine — अनिवार्य सत्य

ये वे मूल सत्य हैं जिन पर प्रत्येक मसीही का विश्वास अनिवार्य है:

  • यीशु मसीह की परमेश्वरता — वचन देहधारी हुआ और परमेश्वर है। (यूहन्ना 1)
  • यीशु के द्वारा उद्धार — विश्वासी का उद्धार यीशु में है। (रोमियों 10:9)
  • पवित्र आत्मा का निवास, सामर्थ्य और वरदान
  • प्रेम की प्रधानता — प्रेम बिना किसी वरदान का कोई अर्थ नहीं। (1 कुरिन्थियों 13)

नोट: भाषाएँ बोलना या न बोलना उद्धार का आधार नहीं है—यह Essential सिद्धांतों में नहीं आता।

(ख) Non-Essential Doctrine — गैर-आवश्यक विषय

इन पर मतभेद उद्धार को प्रभावित नहीं करते और कलीसिया में सहिष्णुता के साथ चर्चित हो सकते हैं:

  • भाषाएँ स्वर्गीय हैं या पृथ्वी की
  • क्या यह वरदान केवल प्रारम्भिक कलीसिया तक सीमित था
  • सार्वजनिक सभा में भाषाओं की भूमिका और शर्तें
“एक-दूसरे के मतभेदों का आदर करो; महत्वपूर्ण विषयों में एकता, गैर-महत्वपूर्ण विषयों में स्वतंत्रता।” — (रोमियों 14:1–4 संदर्भानुसार)

3. आज के विवाद: कारण और परिणाम

विवाद के मुख्य कारणों में संप्रदायिक टकराव, शास्त्रीय व्याख्या का भिन्न होना, भावनात्मक प्रयोग और वरदानों का दुरुपयोग शामिल हैं। परन्तु शास्त्र हमें अनुशासन, क्रम और प्रेम में चलने की शिक्षा देता है:

“परन्तु सब कुछ अच्छी रीति और क्रम से हो।” — 1 कुरिन्थियों 14:40

4. कलीसिया के लिए बाइबलीय संतुलन

कलीसिया को चाहिए कि वह:

  • भाषाओं को पवित्र आत्मा का वरदान माने
  • सार्वजनिक सभा में व्याख्या का नियम लागू करे
  • निजी प्रार्थना में आत्मा की उन्नति को स्वीकार करे
  • मतभेदों में प्रेम, विनम्रता और एकता बनाए रखे
“और ऊपर से इन सब के ऊपर प्रेम को धारण करो, जो एकता का बंधन है।” — कुलुस्सियों 3:14

5. निष्कर्ष

अन्य भाषाओं का वरदान न तो विभाजन का कारण होना चाहिए और न ही आत्मीय श्रेष्ठता का प्रमाण। यह पवित्र आत्मा का दिया हुआ एक आध्यात्मिक साधन है—जिसका लक्ष्य परमेश्वर की महिमा, कलीसिया का निर्माण और मसीही जीवन की आत्मिक उन्नति है।

भाषाएँ बोलना या न बोलना किसी को अधिक या कम मसीही नहीं बनाता; मसीही की पहचान प्रेम में रहती है:

“यदि तुम एक-दूसरे से प्रेम रखो, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।” — यूहन्ना 13:35

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